साथ में
एक दिन वो आया मेरे पास और बोला चलो चलते हे,
उस दुनिया में जहाँ पेड़ो की छाँव हो;
सागर की लहरे हों;
नदी का मीठा पानी हो;
और हो कोई ऐसा जो इनको बर्बाद ना करे।
सारी पतझड़ चली गयी पर तुम नहीं आये,
डूबी रही मैं तुम्हारी यादो;
एक ऐसी दुनिया के लिए
जो हो अपने जैसी।
फिर पूछा मैंने उससे कहाँ होगा ये जहाँ
जो तू सपने में देखती हो,
जमाना फूल तोडना जानता है ; उगाना नहीं,
फूल को तिजोरी में बंद करना जानता; बाग में खिला हुआ नहीं।
फिर क्या था उठाई उसने अपनी झोली और चल दिया
अपने रस्ते
जहाँ से वो आया
बहुत ही दूर उस बेनाम अँधेरे में जहाँ रौशनी भी नही आती
जहाँ हवा भी नहीं चलती ,
वहीँ जहाँ कोई नही आता!
वहीँ जहाँ कोई नही आता!
- राजकुमार
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