साया था या कोई और …
उस बेजान सी सड़क पर जो जाती थी जंगल से होते हुए,
चली जाती थी मैं वहां से होते हुए जहां से एक पगडंडी थी।
घना भरा सा जंगल जिसमें न थी कोई साथी था न ही कोई संकेत,
बढती रही मैं आगे ही को; पीछे मुड़कर भी नहीं देखा सुनी राह को।
लगता था कोई साथ हे मेरे उस घने जंगले मैं,
पर कौन है वो जो मेरे साथ चल रहा था ,
क्या
मेरा साया था!
या
था वो जो लेता है अंगड़ाई
बच्चा बन माँ की गोद में ,
करता है सवेरा सूरज बनकर,
बहता है हवा बनकर,
रहता है हर एक पल में ।
हौले से मुस्कुराई मैं और चल दी,
उसी पगडंडी पर जो जाती थी जंगल से होते हुए।
- राजकुमार
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