Monday, 22 December 2014

Saaya tha yaa koi aur

साया था या कोई और …  

उस बेजान सी सड़क पर जो जाती थी जंगल से होते हुए,
चली जाती थी मैं वहां से होते हुए जहां से एक पगडंडी थी। 

घना भरा सा जंगल जिसमें न थी कोई साथी था न ही कोई संकेत,
बढती  रही मैं आगे ही को; पीछे मुड़कर भी नहीं देखा सुनी राह को। 

लगता था कोई साथ हे मेरे उस घने जंगले मैं,
पर कौन है वो जो मेरे साथ चल रहा था ,
क्या 
मेरा साया था!
या
था वो जो लेता है अंगड़ाई 
बच्चा बन माँ की गोद में ,
करता है सवेरा सूरज बनकर,
बहता है हवा बनकर,
रहता है हर एक पल में । 

हौले से मुस्कुराई मैं और चल दी,
उसी पगडंडी पर जो जाती थी जंगल से होते हुए। 

-  राजकुमार

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