Friday, 23 January 2015

समझ

समझ

लिखी किताब कई पन्नो की,
बना दी एक और मजबूरी 
उसे पढने वाले की 
फिर भी
नही समझा पा रहा 
इस ना समझ को 
 की अब 
बहुत हुआ ये खेल 
दरख्तो को छानने का

अब तो बंद करदे
ये ना समझी भरी बाते लिखना

पर वो मन नहीं
लिखता गया और लिखता गया
ऐसे ही लिखते लिखते
श्याही ख़त्म हो गयी
दवात में और उसकी
ज़िन्दगी की सांसो में

आखिर बंद तो हुआ सिलसिला
लिखने और समझने का 
लेकिन 
फिर उठेगी कलम कंही
उन हाथों में
और
लिखने लग जाएगी
कई-कई बातें 
बेमतलब  की !


- राजकुमार 

Thursday, 25 December 2014

Haa Hai!!!

             हाँ है 

सुनी आँखों में पानी भरने से पहले
हवाओं का रुख बदलने से पहले
         आ गए होते तुम
     और बस कह देते हाँ है;

      पर तेरा वो रूखापन;
    बदले-बदले से मिजाज
      बातों में कसमसाहट
      झकझोरती रही मुझे। 

 फिर भी आँखे जागी रातों को,
       आराम गया दिल का,
      और पहुँच गया ये मन
       उस जगह जहाँ पर 
  न तो पानी होता था पीने को 
और न प्यास होती थी बुझाने को,

         पर न जाने क्यूँ ,
    न तो तूने अपने लब  खोले 
और न हि  खोला मुंदी आँखों को
  बेचेंन  हो गए पल छीन सारे मेरे
     बस इतना सुनने को की
                हाँ हैं 
  
हाँ है हवाले तेरे अब तो ये साँसे
  हाँ है हमें तुम्हारे साथ रहना;
        हाँ है, हाँ है, हाँ है 
सिर्फ तुम्हारे वास्ते मेरी हाँ है!!!

                  -   राजकुमार 








Wednesday, 24 December 2014

Pahle

सबसे पहले
बुझे चिरागो को रोशनी करने से पहले,
टूटे हुए दिल के जख्म भरने से पहले,
आ देख तो सहि कितना अँधेरा है यंहा,
आ देख तो सहि कितने जख्म हुए हैं मुझे।।
थिरकती, शाम में भी वो बात न रही,
जो करती थी नशा मोहब्बत तुम्हारी मुझे,
लेकर चले जाते तुम सारे सपने तुम्हारे,
कब तक संजोता फिरूँ उन्हें रोज-रोज मैं।।
आ कर एक नजर देख तो लेते हमें,
साँस थोड़ी ही तो बाकी रेह गई मुझमें ,
गुनाह किया होता तो सजा भी कुबूल थी,
इस पाक से रिश्ते को पल भर में क्युँ तोड़ गए यूँ।।

Monday, 22 December 2014

Saaya tha yaa koi aur

साया था या कोई और …  

उस बेजान सी सड़क पर जो जाती थी जंगल से होते हुए,
चली जाती थी मैं वहां से होते हुए जहां से एक पगडंडी थी। 

घना भरा सा जंगल जिसमें न थी कोई साथी था न ही कोई संकेत,
बढती  रही मैं आगे ही को; पीछे मुड़कर भी नहीं देखा सुनी राह को। 

लगता था कोई साथ हे मेरे उस घने जंगले मैं,
पर कौन है वो जो मेरे साथ चल रहा था ,
क्या 
मेरा साया था!
या
था वो जो लेता है अंगड़ाई 
बच्चा बन माँ की गोद में ,
करता है सवेरा सूरज बनकर,
बहता है हवा बनकर,
रहता है हर एक पल में । 

हौले से मुस्कुराई मैं और चल दी,
उसी पगडंडी पर जो जाती थी जंगल से होते हुए। 

-  राजकुमार

Sunday, 21 December 2014

Sath me

साथ में 
एक दिन वो आया मेरे पास और बोला चलो चलते हे,
उस दुनिया में जहाँ पेड़ो की छाँव हो;
सागर की लहरे हों;
नदी का मीठा पानी हो;
और हो कोई ऐसा जो इनको बर्बाद ना करे।

सारी पतझड़ चली गयी पर तुम नहीं आये,
डूबी रही मैं तुम्हारी यादो;
एक ऐसी दुनिया के लिए
जो हो अपने जैसी।

फिर पूछा  मैंने उससे कहाँ होगा ये जहाँ
जो तू सपने में देखती हो,
जमाना फूल तोडना जानता है ; उगाना  नहीं,
फूल को तिजोरी में बंद करना जानता; बाग में खिला हुआ नहीं।

फिर क्या था उठाई उसने अपनी झोली और चल दिया
अपने रस्ते
जहाँ से वो आया
बहुत ही दूर उस बेनाम अँधेरे में जहाँ रौशनी भी नही आती
जहाँ  हवा भी नहीं चलती ,
वहीँ जहाँ कोई नही आता!

- राजकुमार