Friday, 23 January 2015

समझ

समझ

लिखी किताब कई पन्नो की,
बना दी एक और मजबूरी 
उसे पढने वाले की 
फिर भी
नही समझा पा रहा 
इस ना समझ को 
 की अब 
बहुत हुआ ये खेल 
दरख्तो को छानने का

अब तो बंद करदे
ये ना समझी भरी बाते लिखना

पर वो मन नहीं
लिखता गया और लिखता गया
ऐसे ही लिखते लिखते
श्याही ख़त्म हो गयी
दवात में और उसकी
ज़िन्दगी की सांसो में

आखिर बंद तो हुआ सिलसिला
लिखने और समझने का 
लेकिन 
फिर उठेगी कलम कंही
उन हाथों में
और
लिखने लग जाएगी
कई-कई बातें 
बेमतलब  की !


- राजकुमार